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ओवैसी बोले- जब मराठों को आरक्षण मिल सकता है, तो मुसलमानों को क्यों नहीं

एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी, बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील केटीएस तुलसी ने एक प्रोग्राम में शिरकत  की. इस दौरान असदुद्दीन ओवैसी ने आरक्षण पर बात करते हुए कहा कि मराठों और बाकि जाति के लोगों को जब आरक्षण मिल सकता है तो मुसलमानों को क्यों नहीं मिल सकता.

ओवैसी बोले- जब मराठों को आरक्षण मिल सकता है, तो मुसलमानों को क्यों नहींऔवेसी ने बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहा कि आप सच्चर कमेटी की बात करते हैं तो इसको आपने कितना लागू किया. आप मुस्लिम आरक्षण की बात करते हैं, पांच साल कर्नाटक में आपकी(बीजेपी) सरकार थी, तब आपने मुस्लिमों को आरक्षण दिया? उन्होंने कहा कि मुस्लिमों में भी कई जातियां होती हैं जिनको आप आरक्षण दे सकते हैं.

औवेसी ने कहा कि संविधान हमको 1950 में मिला और इस देश को आजाद हुए 70 साल हो गए, मैं भी इस देश का नागरिक हूं. अगर मोदी सरकार मुस्लिमों को बराबर का नागरिक मानती है तो हमें संवैधानिक अधिकार दीजिए. आर्टिकल 15 और 16 के तहत हमको आरक्षण मिलना चाहिए.

औवेसी के इस बयान का जवाब देते हुए बीजेपी के प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि हमने स्किल इंडिया कार्यक्रम शुरू किया. उसके सबसे ज्यादा लाभार्थी मुस्लिम वर्ग के लोग हैं. हमने सभी योजनाएं सबके लिए शुरू की. आप(औवेसी) गुजरात को लेकर बोलते हैं. गुजरात में मुस्लिमों का प्रतिशत 7.5 से 8.5 प्रतिशत है. सरकारी नौकरी में 7.5 से 8.5 प्रतिशत है. और बंगाल में मुस्लिम 27 फीसदी हैं. सरकारी नौकरी में 1.8 फीसदी  मुस्लिम हैं. यह हकीकत है.

बीजेपी प्रवक्ता ने कहा कि 1931 में जो जनगणना हुई थी उसमें भारत की साक्षरता दर 8 फीसदी थी.और यूपी में मुस्लिम समाज की साक्षरता दर 24 फीसदी थी. जबकि ब्राह्मण की सिर्फ 15 फीसदी थी. क्योंकि तब जाति के आधार पर जनगणना हुई थी. मुस्लिमों को सिर्फ बेवकूफ बनाया गया है.

सुधांशु त्रिवेदी के बयान पर जवाब देते हुए औवेसी ने कहा कि आखिर जब हम इतने पीछे हो गए हैं तो हमें आरक्षण दीजिए. आप(बीजेपी) गुजरात की बात करते हैं, बीजेपी के कितने मुस्लिम सांसद लोकसभा में जीत के आए. आखिरी बार गुजरात में मुस्लिम सांसद ने 25 साल पहले जीता था.

इस पर जवाब देते हुए बीजेपी प्रवक्ता ने कहा कि अगर मुस्लिमों को पढ़ने के मौके नहीं मिले, इसके सबूत हों तो उनको आरक्षण दिया जा सकता है. आपको पढ़ने का मौका मिला और आपने पढ़ना छोड़ दिया, इसपर आरक्षण नहीं दिया जा सकता. उन्होंने कहा कि संविधान में धार्मिक आधार पर आरक्षण देने का कोई प्रावधान नहीं है. धार्मिक आधार पर सिर्फ एक बार आरक्षण दिया गया था इस देश में, 1916 में. वहीं सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता केटीएस तुलसी ने कहा कि अगर जाति के आधार पर आरक्षण दिया जा सकता है तो धर्म के आधार पर क्यों नहीं दिया जा सकता.

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