
दस्तक ब्यूरो: अरविंद केजरीवाल को शराब घोटाला मामले में दोषमुक्त किए जाने की घटना भारतीय राजनीति में केवल एक न्यायिक निर्णय भर नहीं रह जाती,वह तुरंत ही राजनीतिक विमर्श का केंद्र बन जाती है। सवाल उठता है।क्या यह न्यायालय की सामान्य प्रक्रिया का परिणाम है, या इसके पीछे कोई बड़ी राजनीतिक रणनीति काम कर रही है?

भारत का संविधान न्यायपालिका को स्वतंत्रता प्रदान करता है। अदालतें साक्ष्यों और तर्कों के आधार पर निर्णय देती हैं, न कि राजनीतिक संकेतों पर। यदि किसी मामले में आरोप सिद्ध नहीं होते, तो दोषमुक्ति स्वाभाविक परिणाम है। इस दृष्टि से देखें तो इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली का सामान्य और स्वस्थ संकेत माना जाना चाहिए।

परंतु भारतीय राजनीति का स्वभाव केवल कानूनी निष्कर्षों तक सीमित नहीं रहता। आम आदमी पार्टी लंबे समय से यह आरोप लगाती रही है कि उसके नेताओं के विरुद्ध जांच एजेंसियों का उपयोग राजनीतिक दबाव बनाने के लिए किया गया। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी का तर्क रहा है कि कानून अपना काम कर रहा है और किसी को भी विशेष संरक्षण प्राप्त नहीं है। ऐसे में जब दोषमुक्ति होती है, तो दोनों पक्ष अपने-अपने नैरेटिव को पुष्ट करने की कोशिश करते हैं। एक इसे ‘सत्य की जीत’ कहता है, तो दूसरा ‘न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान’।
राजनीतिक दृष्टि से यह भी विचारणीय है कि क्या इस प्रकार की घटनाएँ चुनावी समय-सारिणी, जनमत या गठबंधन समीकरणों से प्रभावित होती हैं? भारतीय लोकतंत्र में आरोप-प्रत्यारोप की परंपरा पुरानी है, परंतु बिना ठोस प्रमाण के किसी निर्णय को रणनीति करार देना न्यायिक संस्थाओं पर अनावश्यक अविश्वास भी पैदा कर सकता है।

वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या हमारी राजनीति अब इस स्तर पर पहुँच चुकी है जहाँ हर न्यायिक निर्णय को राजनीतिक चश्मे से देखा जाएगा? यदि हाँ, तो यह लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है। न्यायपालिका की विश्वसनीयता और राजनीतिक दलों की जवाबदेही।दोनों की रक्षा आवश्यक है।
अंतत: केजरीवाल की दोषमुक्ति को न तो चमत्कारिक राजनीतिक चाल कहकर खारिज किया जाना चाहिए, न ही इसे पूर्ण नैतिक विजय का प्रतीक मानकर राजनीतिक पूंजी में बदला जाना चाहिए। लोकतंत्र की परिपक्वता इसी में है कि हम संस्थाओं पर विश्वास बनाए रखें और तथ्यों को भावनाओं से ऊपर स्थान दें।




