अन्तर्राष्ट्रीय

Indus Water Treaty विवाद में बढ़ी भारत की चिंता, हेग कोर्ट में पाकिस्तान को मिल सकता है फायदा

नई दिल्ली : भारत और पाकिस्तान के बीच जल बंटवारे को लेकर दशकों पुरानी (Indus Waters Treaty) एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर विवाद का केंद्र बन गई है। नीदरलैंड के हेग स्थित (PCA) में चल रही कार्यवाही को लेकर भारत की चिंता बढ़ गई है, क्योंकि संकेत मिल रहे हैं कि अदालत पाकिस्तान के पक्ष में एकतरफा अंतरिम फैसला दे सकती है। भारत पहले ही इन कार्यवाहियों को “अवैध” बताते हुए बहिष्कार कर चुका है और इसमें भाग लेने से इनकार करता रहा है।

भारत का कहना है कि PCA के तहत हो रही सुनवाई सिंधु जल संधि के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है। भारत ने बार-बार यह दोहराया है कि वह केवल न्यूट्रल एक्सपर्ट की प्रक्रिया को ही वैध मानता है। इसके बावजूद PCA ने 12 मार्च और 21 मार्च को आदेश जारी करते हुए आगे की सुनवाई का रास्ता साफ किया। भारत को 30 मार्च तक अपना रुख स्पष्ट करने का मौका दिया गया था, लेकिन भारत ने अपनी स्थिति में कोई बदलाव नहीं किया।

PCA अब पाकिस्तान की ओर से दायर याचिका पर अंतरिम राहत देने पर विचार कर सकता है। इसमें जम्मू-कश्मीर में चल रहे रैटल और किशनगंगा जैसे हाइड्रो प्रोजेक्ट्स पर रोक लगाने की मांग शामिल है। यदि अदालत एकतरफा फैसला देती है, तो इससे दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ सकता है, खासकर तब जब भारत पहले ही संधि को निलंबित करने की बात कह चुका है।

PCA ने संकेत दिया है कि 26 से 28 अप्रैल के बीच हेग के पीस पैलेस में इस मामले की मौखिक सुनवाई हो सकती है। अगर भारत इसमें हिस्सा नहीं लेता है, तो पाकिस्तान अपनी दलीलें एकतरफा तरीके से पेश करेगा, जिससे निर्णय का संतुलन प्रभावित हो सकता है। यही कारण है कि यह मामला भारत के लिए कूटनीतिक और रणनीतिक दोनों स्तरों पर बेहद महत्वपूर्ण बन गया है।

क्या है सिंधु जल संधि?

1960 में Jawaharlal Nehru और Ayub Khan के बीच हुए इस समझौते में छह नदियों के जल का बंटवारा तय किया गया था।

भारत को: रावी, ब्यास और सतलुज (पूर्वी नदियां)
पाकिस्तान को: सिंधु, झेलम और चिनाब (पश्चिमी नदियां)

भारत को पश्चिमी नदियों के पानी का सीमित उपयोग (करीब 20%) सिंचाई, बिजली और घरेलू जरूरतों के लिए करने की अनुमति है। इस संधि के तहत एक स्थायी सिंधु आयोग भी बनाया गया, जो दोनों देशों के बीच डेटा साझा करने और विवाद सुलझाने का काम करता है।

अगर PCA पाकिस्तान के पक्ष में अंतरिम फैसला देता है, तो भारत के लिए यह कूटनीतिक चुनौती बन सकती है। हालांकि, भारत पहले ही इस प्रक्रिया को मान्यता नहीं देता, इसलिए किसी भी फैसले का वास्तविक असर सीमित भी रह सकता है। फिर भी, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह मामला भारत-पाक संबंधों और क्षेत्रीय स्थिरता पर असर डाल सकता है।

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