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बालेन शाह की अग्निपरीक्षा शुरू: लिपुलेख ट्रेड से भारत-चीन के बीच बढ़ा दबाव, नेपाल के सामने कूटनीतिक चुनौती

काठमांडू में सत्ता परिवर्तन के बाद नेपाल की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। हालिया चुनावों में ऐतिहासिक जनादेश के साथ बालेन शाह प्रधानमंत्री बने हैं, लेकिन उनके सामने शुरुआत से ही कई जटिल चुनौतियां खड़ी हैं। भारत और चीन के बीच लंबे समय से संतुलन साधता आया नेपाल अब एक बार फिर रणनीतिक खींचतान के केंद्र में है, जहां हर फैसला दूरगामी असर डाल सकता है।

बदले राजनीतिक समीकरण, नई सरकार पर टिकी निगाहें
पिछले साल के राजनीतिक घटनाक्रम और सरकार गिरने के बाद हुए चुनावों ने देश की दिशा बदल दी। पूर्व प्रधानमंत्री के कार्यकाल में नेपाल के चीन के साथ बढ़ते रिश्तों ने भारत-नेपाल संबंधों में खटास पैदा की थी। ऐसे में अब नई सरकार की विदेश नीति पर सबकी नजरें टिकी हैं। दक्षिण एशिया के अन्य देशों में चुनाव से पहले भारत विरोधी रुख अपनाने वाले नेताओं का बाद में रुख बदलने का ट्रेंड देखा गया है, लेकिन बालेन शाह की रणनीति को लेकर अभी स्पष्ट तस्वीर सामने नहीं आई है।

मेयर से प्रधानमंत्री तक: अनुभव बनाम अपेक्षाएं
बालेन शाह ने काठमांडू के मेयर के तौर पर लोकप्रियता हासिल की, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर शासन चलाना कहीं अधिक जटिल है। आलोचक मानते हैं कि उन्हें बड़े प्रशासनिक ढांचे और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का सीमित अनुभव है। मेयर रहते हुए उन्होंने कई बार भारत और चीन दोनों को लेकर सख्त बयान दिए थे, जिससे उनकी राष्ट्रवादी छवि बनी। अब प्रधानमंत्री के रूप में उन्हें उसी छवि और व्यावहारिक कूटनीति के बीच संतुलन बनाना होगा।

भारत-नेपाल संबंधों की पृष्ठभूमि और मौजूदा स्थिति
भारत और नेपाल के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध रहे हैं। बीते वर्षों में भारत ने नेपाल के साथ रिश्तों को मजबूत करने के लिए कई पहल कीं, लेकिन पूर्व सरकार के दौरान यह संबंध कमजोर हुए। अब नई सरकार के साथ संबंधों में सुधार की उम्मीद जताई जा रही है, लेकिन यह काफी हद तक बालेन शाह की नीतियों पर निर्भर करेगा।

लिपुलेख ट्रेड बना कूटनीतिक परीक्षा का केंद्र
भारत और चीन ने जून 2026 से लिपुलेख दर्रे के जरिए व्यापार फिर से शुरू करने का फैसला किया है। यह वही इलाका है जिसे नेपाल कालापानी-लिपुलेख-लिंपियाधुरा क्षेत्र के रूप में अपना हिस्सा मानता है। यह विवाद पहले भी नेपाल की राजनीति में बड़ा मुद्दा रहा है और इसे हवा भी मिल चुकी है। बालेन शाह खुद अतीत में इस मुद्दे पर समर्थन जता चुके हैं।

अब उनके सामने दुविधा साफ है। यदि वे इस व्यापार का विरोध करते हैं तो भारत और चीन दोनों नाराज हो सकते हैं। वहीं अगर वे चुप्पी साधते हैं तो देश के भीतर उनकी राष्ट्रवादी छवि को नुकसान पहुंच सकता है।

आंतरिक और बाहरी दबावों के बीच संतुलन की चुनौती
बालेन शाह की सामाजिक पृष्ठभूमि और भारत के साथ सांस्कृतिक जुड़ाव को देखते हुए उनसे बेहतर संबंधों की उम्मीद की जा रही है। दूसरी ओर, चीन भी नेपाल में अपनी आर्थिक और रणनीतिक पकड़ मजबूत कर रहा है। हाल ही में नेपाल की मुद्रा छपाई और उसमें विवादित नक्शे का शामिल होना इस प्रभाव को दर्शाता है।

अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि नई सरकार चीन की बेल्ट एंड रोड पहल और भारत की पड़ोसी प्राथमिकता नीति के बीच संतुलन कैसे बनाती है। यही संतुलन नेपाल की विदेश नीति की दिशा तय करेगा।

राजनीतिक भविष्य दांव पर
नेपाल की राजनीति में अक्सर नेताओं पर किसी एक देश के पक्ष में झुकने के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे में बालेन शाह के सामने यह साबित करने की चुनौती है कि वे संतुलित और स्वतंत्र विदेश नीति चला सकते हैं। उनके फैसले न केवल नेपाल के कूटनीतिक संबंधों को प्रभावित करेंगे, बल्कि उनका राजनीतिक भविष्य भी इसी पर निर्भर करेगा।

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